Sunday, November 28, 2010

पत्ता हरा ढूंढें

"खजां का रंग गहरा हो चला है हर तरफ़ लेकिन,
अभी   उम्मीद  है मिल कर   कोई पत्ता हरा ढूंढें"

4 comments:

  1. गई रुत की भटकती राह में फिर ले चलें खुद को
    तुम्हें आवाज़ दें , फिर ज़िंदगी तेरा पता ढूँढें

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  2. ख़ूबसूरत ब्लॉग , सुन्दर कवितायेँ और शेर . आप जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे.

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  3. "जो दिल का दर्द न समझे नज़र कि ओट हो जाये
    हमें है क्या ग़रज़ कि हम उसी का आसरा ढूंढें"

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  4. जनाब रूप साहब, आदाब...
    उम्दा शायरी पेश करने के लिए मुबारकबाद.
    उम्मीद है इसी तरह का कलाम आगे भी पढ़ने को मिलेगा...
    कभी वक्त मिले तो
    जज़्बात جذبات Jazbaat
    पर भी तशरीफ़ लाएं.

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