Wednesday, December 1, 2010

"दानिश" भाई एक ग़ज़ल लिखी है उम्मीद है
पसंद  करेंगे. शुरूआती  दो शेर मेरे संकलन

"गुनगुनाएं साथ साथ" में १९८५ में छप चुके हैं.
ग़ज़ल

"राज़ खुलता देख कर वो दिल में घबराने लगे,
मेरे अफ़साने  उन्हें ख़ुद अपने अफ़साने लगे.

सच कहूँ  कैसा लगा आँखों को उनकी देख कर,
काँच के दो सुरमई रंगीन पैमाने लगे .

तुम समझ लेना मुक़म्मल हो गयी है आशिक़ी,
जब पिघल कर दिल कभी आँखों में लहराने लगे.

अपने एहसासों का है इक जाल सा चारो तरफ,

छूटना चाहे जो  दिल ये,  जान ही जाने लगे.
गुमशुदा ही मान लो जिनसे मिले न हम कभी,
और जो मिलते गए वो दोस्त कहलाने लगे."
"रूप" ०१.१२.२०१०

4 comments:

  1. सच कहूँ कैसा लगा आँखों को उनकी देख कर,
    काँच के दो सुरमई रंगीन पैमाने लगे .

    वाह-वा !!
    ग़ज़ल कee पुख्ता रवायत को निभाते हुए
    खूबसूरत अश`आर ....
    ज़बान-ओ-बयान की उम्दा तरतीब ...
    कामयाब ग़ज़ल
    मुबारकबाद .

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  2. तुम समझ लेना मुक़म्मल हो गयी है आशिक़ी,
    जब पिघल कर दिल कभी आँखों में लहराने लगे.

    bahut khoob!

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  3. Merry Christmas
    hope this christmas will bring happiness for you and your family.
    Lyrics Mantra

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  4. nav varsh ki
    dheron dheron
    SHUBH KAAMNAAEIn .

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