Wednesday, December 1, 2010

"दानिश" भाई एक ग़ज़ल लिखी है उम्मीद है
पसंद  करेंगे. शुरूआती  दो शेर मेरे संकलन

"गुनगुनाएं साथ साथ" में १९८५ में छप चुके हैं.
ग़ज़ल

"राज़ खुलता देख कर वो दिल में घबराने लगे,
मेरे अफ़साने  उन्हें ख़ुद अपने अफ़साने लगे.

सच कहूँ  कैसा लगा आँखों को उनकी देख कर,
काँच के दो सुरमई रंगीन पैमाने लगे .

तुम समझ लेना मुक़म्मल हो गयी है आशिक़ी,
जब पिघल कर दिल कभी आँखों में लहराने लगे.

अपने एहसासों का है इक जाल सा चारो तरफ,

छूटना चाहे जो  दिल ये,  जान ही जाने लगे.
गुमशुदा ही मान लो जिनसे मिले न हम कभी,
और जो मिलते गए वो दोस्त कहलाने लगे."
"रूप" ०१.१२.२०१०

Sunday, November 28, 2010

पत्ता हरा ढूंढें

"खजां का रंग गहरा हो चला है हर तरफ़ लेकिन,
अभी   उम्मीद  है मिल कर   कोई पत्ता हरा ढूंढें"

Tuesday, November 16, 2010

Gungunayein Sath Sath

"ज़िन्दगी के  गीत गाएं गुनगुनाएं  साथ  साथ
आज  हर  दुःख  भूल  जाएं  मुस्कुराएं साथ  साथ
हम   भले  ही  बन  न  पाएं चाँद  तारों  की तरह 
दूर  कर  दें ये  अँधेरे  टिमटिममाएं साथ साथ "